"महामृत्युंजय" का अर्थ है "मृत्यु पर महान विजय।" भगवान शिव को जन्म-मृत्यु और शारीरिक कष्टों के चक्र से मुक्ति देने वाले के रूप में पूजा जाता है। यंत्र महामृत्युंजय मंत्र की प्रतिध्वनि धारण करता है, जो निरंतर सुरक्षात्मक और उपचारात्मक तरंगें उत्सर्जित करता है।
यह यंत्र ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद के सिद्ध महामृत्युंजय मंत्र की ज्यामितीय अभिव्यक्ति (Geometric Form) है। मान्यता है कि जहाँ इस महायंत्र की नित्य पूजा और दर्शन होते हैं, वहाँ से अकाल मृत्यु का भय, नकारात्मक ऊर्जा, असाध्य रोग और ग्रह दोष सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
"हम त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते हैं, जो प्रत्येक श्वास में सुगंधित हैं और समस्त सृष्टि का पोषण करते हैं। जिस प्रकार पका हुआ खरबूजा बेल के बंधन से मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार हम मृत्यु एवं नश्वर बंधनों से मुक्त होकर अमरत्व को प्राप्त हों।"
महामृत्युंजय यंत्र के सम्मुख इस मंत्र का नित्य 108 बार रुद्राक्ष माला से जाप करने पर साधक को अमोघ प्राण शक्ति और मानसिक शांति का अनुभव होता है।
प्रत्येक कोण, वृत्त और कमल दल ब्रह्मांडीय ऊर्जा और शिव शक्ति के विशिष्ट आयाम को दर्शाते हैं।
यंत्र का केंद्र बिंदु साक्षात निराकार शिव तत्व का प्रतीक है। यह समस्त ब्रह्मांडीय शक्तियों का उद्गम एवं मिलन स्थल है, जहाँ से प्राण ऊर्जा चारों दिशाओं में प्रवाहित होती है।
ऊर्ध्वमुखी एवं अधोमुखी त्रिकोण शिव और शक्ति के शाश्वत संतुलन, अग्नि तत्व एवं पंचमहाभूतों के समन्वय को स्थापित करते हैं जो नकारात्मकता का संहार करते हैं।
आठ कमल की पंखुड़ियां अष्ट सिद्धियों, प्रकृति के आठ अंगों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार) का शुद्धिकरण और संपूर्ण आरोग्य प्रदान करती हैं।
सोलह कमल दल सोलह कलाओं और मानव शरीर की सूक्ष्म नाड़ियों को जागृत कर आंतरिक शांति, ओज एवं आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं।
ये तीन चक्र काल के तीनों आयामों (भूत, वर्तमान, भविष्य) तथा तीनों लोकों पर विजय और महाकाल के त्रिशूल की सुरक्षा कवच का प्रतीक हैं।
चारों दिशाओं में स्थित द्वार समस्त दिशाओं से आने वाली अनिष्टकारी शक्तियों को रोकते हैं और वास्तु दोषों का स्वतः शमन करते हैं।
महामृत्युंजय यंत्र की नियमित आराधना और दर्शन से प्राप्त होने वाले चमत्कारी आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ।
आकस्मिक बीमारी से रक्षा, उपचार में सहायता और आशीर्वादित अनुष्ठानों से जीवनशक्ति।
नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नज़र और आध्यात्मिक विघ्नों से सुरक्षा कवच।
राहु, केतु, शनि और काल सर्प दोष के अशुभ प्रभावों को शांत करता है।
गहन ध्यान अवस्था और भगवान शिव का शांत आशीर्वाद।
शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, राहु-केतु की महादशा और कालसर्प दोष के तीव्र दुष्प्रभावों को शांत करता है।
घर या व्यापार स्थल पर स्थापित करने से वहाँ का वास्तु दोष समाप्त होता है और निरंतर सात्विक ऊर्जा बनी रहती है।
घर अथवा पूजा स्थल पर महामृत्युंजय यंत्र की स्थापना एवं प्राण-सक्रियण की प्रामाणिक वैदिक प्रक्रिया।
यंत्र स्थापना हेतु सोमवार या शिवरात्रि/प्रदोष व्रत का दिन उत्तम है, ब्रह्म मुहूर्त (4:30–6:00 पूर्वाह्न) में।
उत्तम काल : सोमवार, प्रदोष व्रत, महाशिवरात्रि या सावन मास।यंत्र को पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा में, आंखों के स्तर पर एक स्वच्छ लकड़ी की वेदी पर स्थापित करें।
दिशा : पूर्व या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण)।दूध और गंगाजल से धीरे-धीरे स्नान कराएं, चंदन-कुमकुम लगाएं और ताज़े पीले फूल अर्पित करें।
सामग्री : पंचामृत, गंगाजल, चन्दन, भस्म, अक्षत एवं पीले पुष्प।घी का दीपक व धूप जलाकर, रुद्राक्ष माला से महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप करें।
मंत्र साधना : 108 या 1008 महामृत्युंजय मंत्र जप।हाँ, कोई भी श्रद्धालु पवित्र भाव और श्रद्धा से इस यंत्र की स्थापना अपने घर, मंदिर या कार्यस्थल पर कर सकता है। प्रतिदिन स्नान के उपरांत धूप-दीप दिखाना और एक माला मंत्र का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी होता है।
आश्रम स्थित महामृत्युंजय यंत्र पूर्ण वैदिक प्राण-प्रतिष्ठा से अभिमंत्रित है और यहाँ निरंतर 12 करोड़ बेलपत्र संकल्प एवं महारुद्राभिषेक अनुष्ठान होते हैं। इसके सान्निध्य में की गई परिक्रमा और ध्यान कई गुना अधिक फलदायी होता है।
शास्त्रों के अनुसार तांबा (Copper), अष्टधातु, पीतल या पंचधातु पर उत्कीर्ण यंत्र सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। तांबे में ब्रह्मांडीय शिव तरंगों को अवशोषित व उत्सर्जित करने की सर्वाधिक क्षमता होती है।
आश्रम पधारकर साक्षात दिव्य महायंत्र की परिक्रमा करें, वैदिक ध्यान सत्र में भाग लें और स्वामी सहजानंद सरस्वती जी महाराज से पावन आशीर्वाद प्राप्त करें।